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अनुक्रम २ ॐ ईशावास्यमिदम् सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत। तेनत्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम ॥1॥ तुम्हारे घर के दरवाजे में आग है, जो कपड़े पहन कर बैठे हो उसमें आग है, किताबों में आग है, तेल में आग है। यह आग तुम्हे दिखाई ९ देती। यह जो मूर्त वस्तु है इसमें कोई अमूर्त है, सन्निहित है, सन्निविष्ट है, समाहित है। दूध से मक्खन बाहर निकाला तो पता चला यह दूध में था पर दिखा नहीं। दूध में पानी है पर दिखा नहीं। दूध में वे ठोस कण जो पदार्थ विज्ञान में कार्बन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन से बने कम्पाउण्ड हैं पर दिखते नहीं। संसार में जितने पदार्थ हैं उन्हें झूम इन करके आगे चलते जावें तो अन्त में एक पार्टीकल तक पहुँच जावेंगे। यह पार्टीकल भी अन्तिम क्रम नहीं है। अब पदार्थविज्ञान यह भी सिद्ध कर चुका है कि यह अन्तिम पार्टीकल भी एक स्पन्दन मात्र है, वाइब्रेशन है। वेद इसे नाद कहता है। लेकिन यह नाद अनहद नाद है। अनहद नाद याने अनाहत नाद। अनाहत मतलब इसे तुमने, हमने या किसी मशीन ने नहीं पैदा किया है, जो स्वकीय है। वही ब्रह्म है, यही ब्रह्म है, केवल ब्रह्म है, ब्रह्म ही ब्रह्म है। जो जो भी जड़-चेतन इस समग्र ब्रह्माण्ड में दृश्य-अदृश्य है सब का सब व्याप्त है, परिपूर्ण है उस इस ब्रह्म से। अर्थात् वह सर्व व्यापक है। वह सब में है और सब कुछ उसके अनुशासन में है। वह ईशन अर्थात् अनुशासन में रखता है इसलिये ईश है, ईश्वर है। जो दिखता है, जो महसूस, होता है, जो अस्तित्वमान है, जो स्थूल है, सूक्ष्म है वह समग्र है। यह समग्र ही जगत है। इस समग्र में वही ईश्वर नित्य निवास करता है। बनाता भी है, बनता भी है, बना भी वही है। वही चल भी रहा है, चलाता भी है। भोग क्या है इसे माण्डूक्य उपनिषद् के सूत्र से समझा जा सकता है। उपनिषद की तीसरे मंत्र में आता है "एकोनविंशतिमुखः स्थूल भुग्वैश्वानरः"। इस सम्पूर्ण सृष्टि का समष्टि स्वरूप वैश्वानर है। यही जाग्रत अवस्था में पदार्थों का भोग भी करता है। भोग तात्पर्य है आहार लेना। जीवधारी अपने उन्नीस मुखों से आहार लेता है जिसमें मुख्यतः पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। अर्थात् देखना, सुनना, रस लेना;खाना, स्पर्श महसूस करना आदि इनका आहार है। यह आहार ही भोग है। यह भोग्य पदार्थ भी किसका धन है? किसीका नहीं। प्रत्येक जीव भोक्ता है। यह भोग्य पदार्थ इसके नहीं है पर इसके लिये है। यही भाव त्यक्त भाव है। त्यक्त भाव से भोग करना अलिप्त भाव है। सच तो यह है कि बिना भोग के कोई रह नहीं सकता पर यह ईश्वर की करुणा और अनुग्रह है जो हमें प्राप्य है। वह भूख देता है तो भक्ष्य भी वही देता है। इसी त्यक्त भाव से इसे ग्रहण करें। ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।। श्रीमद्भगवद्गीता 5/22।। इसमें 'ये हि संस्पर्शजा भोगाः' पद का तात्पर्य है--शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--इन विषयोंसे इन्द्रियोंका रागपूर्वक सम्बन्ध होनेपर जो सुख प्रतीत होता है, उसे 'भोग' कहते हैं। उसमें रम जाना लिप्तभाव है। ये भोग स्थाई नही है, अनित्य है। भोग का अनित्य होना ही त्यक्त भाव है।
रामनारायण सोनी २०.१.२५
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