Sunday, 19 January 2025

ईशावास्योपनिषद् एक विहंगावलोकन

ईशावास्योपनिषद् 
१८ मन्त्र 
 आज से क्रमशः 

अनुक्रम १ 
 ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति: 
अन्वयार्थ :- ॐ = सच्चिदानन्दघन; अदः = वह परब्रह्म; पूर्णम् = सब प्रकारसे पूर्ण है; इदम् यह (जगत् भी); पूर्णम्- पू्र्ण (ही) है; (क्योंकि) पूर्णात् = उस पूर्ण (परब्रह्म )-से ही; पूर्णम् = यह पूर्ण; उदच्यते उत्पन हुआ है; पूर्णस्य = पूर्णके; पूर्णम् = पूर्णको; आदाय = निकाल लेनेपर (भी); पूर्णम् = पूर्ण; एव = ही; अवशिष्यते = बच रहता है। 
व्याख्या :- वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकारसे सदा- सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्म से पूर्ण है; क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरूषोत्तमसे ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्मकी पूर्णतासे जगत् पूर्ण होनेपर भी वह परिपूर्ण है। उस पूर्णमें से पूर्णको निकाल लेनेपर भी वह पूर्ण ही बच रहता है।
रामनारायण सोनी

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अनुक्रम ३

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