इशावास्योपनिषद् अनुक्रम-३ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतम् समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२।। भावार्थ:- इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करें। इस प्रकार मनुष्यत्व का अभिमान रखने वाले तेरे लिए इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं है, जिससे तुझे कर्म फल का लेप ना हो ।। -जिजीविषा और कर्मयोग- पंछी सुबह-सुबह पेड़ पर इसलिए चहचहाते हैं कि उनमें जागते ही एक उल्लास होता है। आज उन्हें जी-भर जीने के लिए उड़ना है। इनकी इस क्रिया-प्रकिया में भी संदेश हैं। जीवन जीने की उत्कट अभिलाषा यानी जि⛸️⛸️जीविषा है। कर्मनिष्ठा है इसलिये अपने कर्म के लिये उद्यत हैं। आशा और विश्वास से भरे भरे से हैं कि वे अपने कर्मक्षेत्र की ओर निकल पड़े हैं और उन्हें अपने जीने के लिये जरूरी आहार अवश्य मिलेगा। चाहे आँधियाँ चले, बारिश हो, सर्दी हो गर्मी हो, मौसम चाहे कैसा भी हो वे गन्तव्य तक पहुंचेंगे ही। वे आश्वस्त हैं कि उनके पंखों में इतनी ऊर्जा है कि वे जावेंगे भी और जा कर वापस लौटेंगे भी। वे प्रकृति से उतना ही लेते हैं जितना उन्हें जीवन जीने के लिये जरूरी है। प्रकृति भी उन्हें अपना ही हिस्सा मानती है इसलिये दाना पानी ले कर बैठी है। उनकी चहचहाट का स्वर समवेत होता है। यह उनका पारम्परिक सहगान है। इस गान में सामूहिक उत्सव प्रियता है, सामाजिक समरसता है, सह-अस्तित्व का संकल्प है, और जीवन के किसी भी खालीपन को उत्साह से भरने का उपक्रम है। किसने किससे से कहा कि चलो चहको! अर्थात् यह समवेत एक उपदेश नहीं संस्कार है, वृत्ति है, स्वभाव है और सांकेतिक आमन्त्रण है। शायद उनमें से ही कोई पंछी है जो इस गान को उकेरता है, याने प्रारम्भ करता है और सभी अपना स्वर मिलाते हैं। लगता है स्वर उनके अपने शब्दकोष और कण्ठ से निकले वे आराधना-अर्चना के स्वर हैं जो उषा और संध्या का वन्दन-अभिनन्दन करते हैं। ये गान अपना स्वर, लय, ताल, स्पन्दन और नाद ले कर निकलते हैं। हर एक स्वर की और समवेत गान की अपनी नैसर्गिक पहिचान है। कोई पंछी यदि गा नहीं पाता है तो लगता है उसके लिये सब गा रहे है। वे शाम को लौट कर इसलिए चहचहाते हैं कि उन्होंने आज जी भर कर जिया है। उनके इन समवेत स्वरों में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव है, रात्रि का स्वागत है और शान्ति का आह्वान भी है। उनमें से अगर कोई उदास भी रह गया है तो उल्लास का समवेत स्वर उसमे रही कमी को भर देगा। घर वापसी में उनके अपने लिये चोंच में कोई दाना संग्रहण के लिये नहीं होता है लेकिन अगर कोई दाना है भी तो घोसले में बैठे चूजों के लिए होता है जो अभी आश्रित हैं; तब तक जब तक कि वे स्वयं उड़ नहीं लेते। वे भी तो कल उड़ेंगे और उड़ कर पा लेंगें। ये जानते हैं कि कभी वे भी चूजे थे। इस उपक्रम में अपरिग्रह के जीवित संदेश हैं। ये पंछी योगी है, कर्मयोगी हैं। इनके अपने यम, नियम हैं, प्रकृति के प्रदत्त प्राण-आयाम हैं। अपने स्वकर्मों में निरत हैं। शायद जानते हैं कि योग: कर्मसु कौशलं। ये जानते होंगे कि कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२।। और कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।।श्रीमद्भगवद्गीता 2/47।। योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2/48।। हे धनञ्जय ! तू आसक्ति का त्याग करके सिद्धि-असिद्धि में सम होकर योग में स्थित हुआ कर्मों को कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।
रामनारायण सोनी १८.१.२५
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